UNIVERSITY OF ALLAHABAD

University of Allahabad: आज से ठीक 134 वर्ष पूर्व आज ही के दिन 23 सितंबर , वर्ष 1887 को आध्यात्मिक संदर्भों में विश्व की  सर्वाधिक उर्वर समझी जाने वाली भारतभूमि के द्वितीय सर्वप्राचीन नगर इलाहाबाद के मातृत्व की छांव में मुझे पदार्पित होने एवं फलने फूलने का महान गौरव नसीब हुआ, हाँ मैं भारत माता की गोद मे जन्मा आपका अपना इलाहाबाद विश्वविद्यालय हूँ ! भले ही मैं शिक्षा जगत में स्वयं को अंगद पगों के समान स्वयं को स्थापित कर चुके अपने तीनो ही भगिनियों/अग्रजों यथा कलकत्ता, मद्रास और बम्बई विश्वविद्यालयों से आयु में 30 वर्ष अल्प हूँ परंतु अंग्रेजी हुकूमत के द्वारा इस पावन धरा पर चलाये गए क्रूर दमन चक्र का मैं भी साक्षी हूँ हाँ मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय हूँ1

मैं  वेद पुराणों में विख्यात गंगा यमुना और सरस्वती की त्रिवेणी के तीर पर अवस्थित आज भी ‘काम मे तो न सही किन्तु नाम मे तो आज भी’ पूरब के ऑक्सफ़ोर्ड की संज्ञा के बोझ को यथासंभव पूरा करने के प्रयास में ,पुनःबदलाव के बयार की आस में सीना ताने खड़ा हूँ, हाँ मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय हूँ1 

मैं (University of Allahabad) आज भी अपने गौरवशाली अतीत के पन्नो में गुम, प्रत्याशित सुनहरे कल को खोजने के प्रयास में, वर्तमान में उलझा हुआ विश्वासहूँ1हाँ मैं शैक्षिक जगत में व्याप्त तिमिर को फिर से मिटा देने का अटूट उच्छवास (लंबी गहरी सांस) हूँ 1 

मैं (University of Allahabad) आज भी अपनी धमनी एवं शिराओं में  स्वसंघटकों के समाहन द्वारा अपने ध्येय सूत्र वाक्य ‘एक वृक्ष अनेक शाखाओ’ (quot rami tot arbores)को प्रासंगिक बनाये रखने की फिराक में ,माकूल पलों की प्रतीक्षा में अपनी जड़ों को सहेजे बैठा हूँ

मेरे प्राचीर रूपी कर्ण आज भी अपने कुलगीत के मधुर संगीत को वास्तविक जयघोष की पुष्पमाला की  तरंगित सुर लहरियों  के माध्यम से पुनःआत्मसात करने को लालायित हैं 1मेरे टिक टिक करते समय सूचक यंत्र रूपी नयन आज भी अपने दोनों कांटो को विराम देकर मानो अतीत की निगाहों से पुनः सुनहरे भविष्य की बाट जोहने को आतुर हों 1 हाँ आपने बिल्कुल ठीक समझा मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय (University of Allahabad)  ही हूँ1

मैं देश दुनिया की प्रतिभाओं से युक्त मेहता साब के अर्थशास्त्र , फ़िराक़ साब की शायरी और महादेवी के रूप में छायावाद के स्तंभों को एक सूत्र में पिरोता माली हूँ

हाँ मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय हूँ

और अंत मे अपने 134वे जन्म दिवस पर अपनी संतानों को गले लगाता,गुहार लगाता एक सवाली हूँ

और आखिर में अश्रुपूरित नयनो से सबसे यही पूछता कि

क्या मैं वही इलाहाबाद विश्वविद्यालय हूँ

क्या मैं वही इलाहाबाद विश्वविद्यालय हूँ

            सिले अधरों के साथ स्वरचित आभार संग वैभव

कामयाब होने के लिये इसे कैसे डेवेलप करे
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