duty

कर्तव्यपरायणता और कर्तव्यनिष्ठाभाव महान है? या फिर मानव जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में स्वयं की एवं सगे सम्बन्धियों की इच्छापूर्ति महान है? 

केवल अपने जीवन को सुगम बनाना, अपने लिए ऐशो आराम के साधन संग्रहीत करना सफलता का सूचक है? या अन्य जन के जीवन को सुगम्यता भाव से लबरेज करके मानव जन्म को सच्चे अर्थों में सार्थक बनाना सफलता है?

 कहीं ऐसा तो नही कि हम कर्तव्यनिष्ठा के मुलम्मे को चढ़ाकर स्वयं का स्वार्थ ही सिद्ध कर रहे हो? कहीं ऐसा भी तो नही कि हम कर्तव्यपरायणता की चाशनी में आत्महित के साधन को ही संजोने की डगर में प्रस्थान कर रहे हो?

 क्या कर्तव्यनिष्ठा और आत्महित विरोधी विचारधाराएं है ? क्या इन दोनों अवधारणाओं के बीच संतुलन की गुंजाइश है?क्या कर्तव्यनिष्ठ होना सफलता का मापक है? या आत्महित सिद्धि ही सफलता का असली रूप है? 

आखिर सफलता को आंका कैसे जाए? कहीं ऐसा तो नही कि आत्म आनंद में लीन होना ही वास्तविक सफलता का द्योतक हो? जिसको जिसमे आनन्द की अनुभूति हो वही सफलता हो किन्तु एक बात तो निश्चित है कि स्वार्थ सिद्धि सफलता का मानदंड कदापि नही हो सकती और निस्वार्थ कर्तव्यपरायणता वास्तविक सफलता क़े पैमाने को ही इंगित करती है और जैसा कहा भी तो गया है कि-

If you salute your duty you don’t need to salute anybody and if you pollute your duty you have to salute everybody . ….Think about it………

लेखक : Dr. Vaibhav Agrawal  

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